मुझे रचना एक संसार अमर
न क्लेश जहाँ, न हो समर
जग बसता ऐसा किस भू पर?
जहाँ कोई ऊँचा न कोई अवर
श्रृंगार निहित कथन में हो
सौंदर्य वासी के मन में हो
पुलकित रहे हर पहर उर
उन्नति शांति-मनन में हो
चिंतन हो बस कल्याण का
न लाभ का, न दाम का
दमन न हो वैचारिक क्रिया
कोई भ्रष्ट शक्ति प्रबल न हो
हे देव! मुझे तुम वर दे दो
है कल्पना, सत्य के पर दे दो
इस काल मरण पृथ्वी पे निश्चित
योग्य उर्वी अगले जनम दे दो
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विकास प्रताप सिंह 'हितैषी'
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