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Sunday, June 10, 2012

खरे हैं


वफ़ा, क़सम, शक, भरम 
हम व्यर्थ के लफ़्ज़ों से परे हैं 
दोस्ती हो या सफ़र इश्क का 
बस इतना पता है कि खरे हैं 
--
विकास प्रताप सिंह 'हितैषी' 

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