पेश-ए-खिदमत है.. एक ताज़ा ग़ज़ल.. अभी नई-२ तराशी हुई
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हवा खामोश है आज तेरी रुसवाई में
सागर मग्न अपनी गहराई में
हवाओं का रुख मोडें या दरिया पार करें हम
कि तू कुछ तो बोल अपनी सफाई में...
अपने सवालों के जवाब चाहियें मुझे
नामुराद खड़ा हूँ तेरी विदाई में
गर बेबुनियाद थी मुहब्बत मेरी
तो कोई सबूत दे तेरी सच्चाई में...
और अगर कुछ कह नहीं सकती
मत दखल दे मेरी तन्हाई में
तुझे मिली है ज़िन्दगी नई, कलमे पढ़!
या खुदा! खूब हारा हूँ इस सुनवाई में
बख्शेगा नहीं दिल मेरा, बेगैरत!
अभी झूम ले शहनाई में
खूब तड़पेगी तू भी हर दिन
कुछ पल तो मेरी जुदाई में
हर बरस ये दिन मनेगा, किसी से
हाल-ए-दिल न कोई कहेगा
बस चर्चे होंगे तेरे बड़े
अब हर दम मेरी रुबाई में
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विकास प्रताप सिंह 'हितैषी'
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