मिट सा गया हूँ.. झुक सा गया हूँ
जीवन सफ़र में रुक सा गया हूँ
सोचा था संग उसके दुनिया बसाऊंगा
मैं उसके साये में सपने सजाऊंगा
फिर ये ज़ुल्म अब क्यूँ हो रहा है?
मेरा दिल ये क्यूँ रो रहा है!
सूरज की किरणें अब गर्म ज्यादा हैं
हर एक पहर में कुछ वक़्त ज्यादा है
मैं इस सहर में बुझ सा गया हूँ
जीवन सफ़र में रुक सा गया हूँ
मेरी मोहब्बत क्या इतनी फीकी थी?
क्या उसकी शोहरत इतनी सजीली थी
जो तू मुझको भूल गया.....
चंदा था रोशन बस तेरे मुखड़े से
है उसका नाता अब मेरे दुखड़े से
सूनी अब राहों पे मुड़ सा गया हूँ
जीवन सफ़र में रुक सा गया हूँ
मेरी नज़र में तेरी हंसी थी
हर एक खबर में बस तेरी ख़ुशी थी
और तू मुझको छोड़ गया....
शामों को यादें फिर भी तेरी आती हैं
घुटता हूँ मैं, आंखें नदियाँ बहाती हैं
अब तन्हाई से जुड़ सा गया हूँ
जीवन सफ़र में रुक सा गया हूँ
मिट सा गया हूँ.. झुक सा गया हूँ
--
विकास प्रताप सिंह 'हितैषी'

No comments:
Post a Comment