हसरतें अभी बाकी हैं बुझे चिराग की
दास्ताँ लिखी जाएगी शाम हो जाने दो
मूक है तो क्या हुआ रोशन होंगे जलवे
दामन-ए-रात में दिन को ढल जाने दो
चांदनी गहराई है आज तेरे गालों से छिटककर
ज़माने भर के अंधेरों को अब मुंह छिपाने दो
हासिल कितने ही गम हों इश्क के साये में!
मोहब्बत के सितारों में बेख़ौफ़ सो जाने दो
ज़ुल्म होते रहे अक्सर गरीबों की बस्तियों में
'शरीफों' के मोहल्ले में भी इंसाफ़ हो जाने दो
(कुछ दिन में भी ख्वाब सजाने दो
(कुछ दिन में भी ख्वाब सजाने दो
.. है तो शायर के नाम से 'हितैषी'
नूर-ए-हुस्न के सुरूर में अब पिघल जाने दो )
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विकास प्रताप सिंह 'हितैषी'
(...) => कार्यरत
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