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Saturday, August 25, 2012

मोड़-ए-ज़िन्दगी

कुछ कश्तियों को कूल, किनारे नहीं मिलते
हर आसमाँ को फकत सितारे नहीं मिलते 
कुछ गुमनाम ही बसर करते हैं जहां में 'विकास'
सबको मोड़-ए-ज़िन्दगी मुस्कुराते नहीं मिलते


ज़माने की रफ़्तार थोड़ी धीमी है, तेज़ भी कभी 
तूफाँ ही सहारा कुछ डोंगियों का 'हितैषी' 
कोई बैठे-बैठे जीने का सबब पा लेता है
किसी को हमकदम-ए-सफर दीवाने नहीं मिलते  

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विकास प्रताप सिंह 'हितैषी'
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