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Wednesday, August 29, 2012

शास्त्रार्थ

पेश है.. तीन दिन पुराना.. एक कवि मित्र 'आशीष श्रीवास्तव' के साथ हुआ मजाकिया शास्त्रार्थ ;) -->

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(वो)
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दिल था एक शोला मगर बीत गए दिन वो 'कतील'
अब कुरेदो ना इसे.. राख में रखा क्या है! 
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कतील शिफाई 

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(मैं)
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राख में चिंगारी बुझती नहीं काफी देर तक
हौंसला रखो 'आशीष' उठोगे फिर जल-२ के
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हितैषी

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(वो)
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दिल के पहलू से आती है सदा आहिस्ता आहिस्ता
बुझी चिंगारी हूँ... दे ना हवा आहिस्ता आहिस्ता
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आशीष

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(मैं)
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बुझी चिंगारी को नए अरमानों की है ज़रूरत फिर मचलने के लिए
तू खडा रह मेरी राख पे हमदम.. आंसू टपकने का इंतज़ार है तेरे
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'हितैषी'

:)

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