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Thursday, September 20, 2012

शेर-ओ-शायरी

नज़ारे भी कैसे-कैसे दिखाती है जिंदगी
उठता हूँ तो फिर से गिराती है जिंदगी ||


आसमां पे टकटकी लगाये रखी दिनभर 
मैं उड़ा नहीं कि बारिश कराती है जिंदगी ||

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आज फिर गज़ल मेरी सिसक-२ के सोई है 
रात ओस की शक्ल में चांदनी भी रोई है ||

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होता है अक्सर ऐसा हमारे साथ भी
दिन नहीं गुज़रता बिन उदास शाम के ||

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क़दमों के निशाँ यहाँ मेरे.. सच में सच हैं या कोई फरेब!
समझ नहीं आता कभी, मेरी दुनिया झूठी है या तेरी, खुदा!

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विकास प्रताप सिंह 'हितैषी'

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