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Tuesday, October 9, 2012

साहिल

मेरी यह कविता एक परम मित्र के लिए जो आजकल पहले प्यार के एकतरफा मायाजाल में थोडा उलझा हुआ है| (नाम गुप्त है :P)... कामना है कि जल्दी ही संभल जाए.. और एक सुकन्या उसके जीवन में शीघ्र ही प्रवेश करे :)
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आजकल
दिल में मचलता सैलाब
मन के साहिल से
कुछ ज्यादा ही 
टकराने लगा है|

शायद 
जिंदगी की भीड़ में
कोई
कुछ ज्यादा ही
याद आने लगा है|

ज़ाहिर है
तू मौज है दरिया की
चंचल, निर्मल
और मेरा अस्तित्व
साहिल सा गुमसुम
तटस्थ, अचल|

पर अब
मनमाने ख्यालों में
अपनी भिडंत से
मेरे सब्र का बाँध
टूट जाने लगा है|

है मालूम मुझे
नहीं हाथ में हाथ
दो ही पल का
हमेशा से
था अपना साथ|

फिर क्यों
जुदाई का दर्द जाली
मुस्कुराने लगा है?
ज़बरदस्ती
मेरी रूह को
तड़पाने लगा है|

कोई मुझे
क्यों इतना
याद आने लगा है!

--
विकास प्रताप सिंह 'हितैषी'

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