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Monday, October 8, 2012

काव्य-प्रेम

कभी-२ अपनी झोली
रस की तलाश में
रुबाइयों से भरता हूँ
कृति-गली फिरता हूँ|
कोई कविता तब पढता हूँ||

जगत-रुपी उद्यान की जब
सूख जाती हरियाली
मन लगता खाली-खाली
साहित्य ओर रुख करता हूँ|
कवि-नगरी विचरता हूँ||

धूमिल घावों को रगड़-रगड़
चंचल भावों को पकड़-पकड़
उर के झिलमिल सितारों को
पन्नों पर अंकित करता हूँ|
अनुप्रास नये कुछ रचता हूँ||

अठन्नियां दे जा चुके महाकवि
चवन्नियां भी यहाँ बहुत पढीं
अनुदान दो आने करता चल
शनैः शब्द-शब्द बस बढ़ता हूँ|
काव्य से ही सजता-संवरता हूँ||

कोमल कर कलम लेकर
जीवन-दर्शन सफर में मैं
कभी चौपाई वाहन पकड़,
कभी दोहों पर दौड़ पड़ता हूँ|
काव्य-ग्राम को चलता हूँ||

तत्त्व-ज्ञान प्राप्ति उपरान्त
समझ और समाज के मध्य
के अंतराल पूर्ति हेतु स्व-
अभिव्यक्तियों से भी लड़ता हूँ|
कोई कविता तब गढ़ता हूँ||

उतरता हूँ
अनुभव करता हूँ
हरता हूँ
उछलता, मचलता
निर्झर उमड़ता हूँ
नेपथ्य, ध्वनि
झरता/झड़ता  हूँ

--
विकास प्रताप सिंह 'हितैषी'

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