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Sunday, November 18, 2012

जीवन सफर में सुबह से हुई है शाम

जीवन सफर में सुबह से हुई है शाम
खग नित करते निज घोंसलों में आराम 
किंतु यहाँ इंतज़ार में बीते बरसों; 

आज-कल में, नहीं तो परसों 
अंतिम रैना भी आनी ही जल्दी 
जब चढ़नी तेरे हाथों में हल्दी 

कुछ लम्हे ही शेष शायद, काट लूँगा
तन्हाई संग थोडा वक्त और बाँट लूँगा 
तुझ संग जो आगाज हुआ था

उस इश्क की है शब-ए-अंजाम
अभी तक तो आया नहीं मेरे खत
के जवाब में कोई तेरा पैगाम!

--
'हितैषी'





(28 अक्टूबर 2012)

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