एक काफ़िला चलता है
रोज़
मेरे नींदों से
तेरे ख़्वाबों तक का
बीच में हँसते-खेलते
कुछ लम्हे मिलते हैं
बीते हुए
जाने कब के!
शायद याद भी नहीं होगा
तुम्हें अब
कि मुझसे कभी
मिली थीं तुम
तेरी वापिस की हुई
अंगूठी
आज भी मेरी मेज़ पर है
नज़रों के ठीक सामने
किसी-२ पल
मजबूर करती है
सोचने को -
जो दिलों का काफ़िला
पहुँच नहीं पाया
मंज़िल तक
कभी उसे
ख़्वाबों में ही
पूरा होने दो
--
'हितैषी'
// गुलज़ार-स्टाइल // ;)
December 13, 2012
रोज़
मेरे नींदों से
तेरे ख़्वाबों तक का
बीच में हँसते-खेलते
कुछ लम्हे मिलते हैं
बीते हुए
जाने कब के!
शायद याद भी नहीं होगा
तुम्हें अब
कि मुझसे कभी
मिली थीं तुम
तेरी वापिस की हुई
अंगूठी
आज भी मेरी मेज़ पर है
नज़रों के ठीक सामने
किसी-२ पल
मजबूर करती है
सोचने को -
जो दिलों का काफ़िला
पहुँच नहीं पाया
मंज़िल तक
कभी उसे
ख़्वाबों में ही
पूरा होने दो
--
'हितैषी'
// गुलज़ार-स्टाइल // ;)
December 13, 2012

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