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Sunday, March 31, 2013

एक काफ़िला चलता है

एक काफ़िला चलता है 
रोज़ 
मेरे नींदों से 
तेरे ख़्वाबों तक का 

बीच में हँसते-खेलते 
कुछ लम्हे मिलते हैं 
बीते हुए 
जाने कब के!

शायद याद भी नहीं होगा
तुम्हें अब
कि मुझसे कभी
मिली थीं तुम

तेरी वापिस की हुई
अंगूठी
आज भी मेरी मेज़ पर है
नज़रों के ठीक सामने

किसी-२ पल
मजबूर करती है
सोचने को -
जो दिलों का काफ़िला
पहुँच नहीं पाया
मंज़िल तक

कभी उसे
ख़्वाबों में ही
पूरा होने दो

--
'हितैषी'

// गुलज़ार-स्टाइल // ;)


December 13, 2012

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