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Sunday, March 31, 2013

पल में ज़िंदगी के मिज़ाज़ बदल गये

आज जब दो वर्षों का मेरा एक सह-निवासी हमेशा के लिए दिल्ली कूच कर गया तो कुछ ऐसे निकले जज़्बात दिल से -->
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वो अलविदा कह कर निकल गये 
पल में ज़िंदगी के मिज़ाज़ बदल गये

रुखसत किया अभी-२ जो देहरी से उसे 
सवालों के खुद-ब-खुद जवाब बदल गये

पहले रंग ही कुछ और था इमारत का 
अब वो नहीं तो सारे हालात बदल गये

उसके नये शहर में माहौल कुछ भी हो
अपने हवा-पानी बिना बात बदल गये

मेरे घर की दीवारें आज उदास हैं ज़रा
दो सालों की रोज़मर्रा मुलाक़ात बदल गए

छज्जे से झुकती पेड़ की शाखें पूछती हैं -
क्यों उसके, मेरे सब दिन-रात बदल गये!

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'हितैषी'

(02/12/2012)

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