गीतों की दावत देता हूँ
लेने प्रसाद अवश्य आना
मोती प्रेम के चुन रखे हैं
पहनने हार अवश्य आना
जीवन को तनिक विश्राम दो
सुनने सार अवश्य आना
होगा उर का उर से मिलन
समझने प्यार अवश्य आना
मानव को मानवता का
देने आधार अवश्य आना
तन-मन-जन की पीड़ा का
करने संहार अवश्य आना
अमन-उपासक संतों को
मिलने हर बार अवश्य आना
स्वयं को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का
देने उपहार अवश्य आना
निज आत्मा के बंधन खोल
करने उद्धार अवश्य आना
जन्म-जन्म की तृष्णा को
तरने अपरम्पार अवश्य आना
[[
सहने अधिकार अवश्य आना
निरंकुश
आत्मीयता से परिचय
देखने
आकांक्षी संतोष-आनंद के
ग्रहण आहार अवश्य आना
स्रोत
पहनने किरदार अवश्य आना
]]
(अपूर्ण)
--
विकास प्रताप सिंह 'हितैषी'
https://www.facebook.com/VPS.hitaishi/posts/141656826013029
about a minute ago

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