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Saturday, May 11, 2013

शत्रु


2013, January 4
२.५ वर्ष पुरानी मेरी एक कविता जिस पर अचानक दृष्टि पड़ी -->
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शत्रु
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एक काल से स्व-शत्रुता अब निर्विघ्न रही है
जिसमें गुम हुआ है तू और डूब गया हूँ मैं |

सौहार्द्र की दरिद्रता में अपुल्कित रहा जीवन
देख! बुझ गया है तू और बीत गया हूँ मैं |

गुरुत्व-भ्रांति दंभ-तिमिर में न प्रसून न प्रभा
है तू भी खाली हुआ और रीत गया हूँ मैं |

शिला के जैसा तू अरि, गिरी के जैसा मैं रिपु
न तू ही विजयी रहा, न जीत सका हूँ मैं |

वसुधा गवाह है अविरत परस्पर दावानल की
प्रतिकूल रहा है तू, विपरीत चला हूँ मैं |

धर्म के अनुलाभ में ईमान भी जब बिक गया
घातक बना है तू, कभी, घायल बचा हूँ मैं |

रहा सहा आयुर्बल भी जीवंतता से अब दूर हुआ
तुझमें ना साँस रही, निर्जीव हुआ हूँ मैं |

तेरा मेरा झगडा अभी तक खत्म नहीं हुआ
पर चूर हुआ है तू और टूट चूका हूँ मैं ||

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'हितैषी'

theme --> our life has been over, living under the shadow of our enmity.. and we have nothing left now.. WE are over but enmity is still intact

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