लोग कहते हैं लिखो सियासत पे, विकास!
पर इसपे चाहे कुछ भी कहो, सब बेमानी है
स्याही के भी हक़दार नहीं जो कमबख्त,
जहां पैर पसारे बैठे हैं... राजधानी है ||
--
विकास प्रताप सिंह 'हितैषी'
--
05/06/2012
पर इसपे चाहे कुछ भी कहो, सब बेमानी है
स्याही के भी हक़दार नहीं जो कमबख्त,
जहां पैर पसारे बैठे हैं... राजधानी है ||
--
विकास प्रताप सिंह 'हितैषी'
--
05/06/2012

No comments:
Post a Comment