मेरे होठों पे तेरे
शब्दों की कहानी है
कुछ बातें तुझे मैंने
बिन कहे सुनानी हैं
दिन सुहाने थे, कभी,
शामें वीरानी हैं...
जो लिखता हूँ आज मैं
तेरी प्रेम निशानी है|
सावनी बूंदों में नहीं सदा
हर नज़्म नहानी है
ना उर की बंसी को अब
कोई राधा रिझानी है
वियोजित होके भी नहीं
तेरी यादें भुलानी हैं...
लफ्ज़ मेरे तू सुनती
इन दिनों
इन दिनों
दुनिया की ज़ुबानी है|
हूँ जो लिखता मैं
आज भी किंतु...
आज भी किंतु...
तेरी प्रेम निशानी है ||
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विकास प्रताप सिंह 'हितैषी'
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