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Tuesday, July 10, 2012

प्रेम निशानी

मेरे होठों पे तेरे 
शब्दों की कहानी है
कुछ बातें तुझे मैंने 
बिन कहे सुनानी हैं 
दिन सुहाने थे, कभी, 
शामें वीरानी हैं...
जो लिखता हूँ आज मैं
तेरी प्रेम निशानी है|

सावनी बूंदों में नहीं सदा 
हर नज़्म नहानी है 
ना उर की बंसी को अब 
कोई राधा रिझानी है 
वियोजित होके भी नहीं 
तेरी यादें भुलानी हैं...

लफ्ज़ मेरे तू सुनती 
इन दिनों
दुनिया की ज़ुबानी है|
हूँ जो लिखता मैं 
आज भी किंतु...
तेरी प्रेम निशानी है ||

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विकास प्रताप सिंह 'हितैषी'

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