( प्रतिदिन मुस्कुराना भर चाहिए)
प्रातःकाल ऐसा जिसमें उल्लेख कुदरत के अरमानों का
सुवर्ण पे सुहागा, सूर्य-लालिमा सा नजराना भर चाहिए
(कामना वशीभूत
किसी नज़र का शरमाना भर चाहिए)
दैनिक गतिविधि निर्वाह को कूच करेगी कौम अभी
बहुधा ऋतु-निर्भीक पंछी का चहचहाना भर चाहिए
मेघ-शून्य हो या अभ्र-पूर्ण नभ सुबह का 'विकास'
ऐसे मौसम में कोई मधुर धुन गुनगुनाना भर चाहिए
उषा की शुभ्र उज्ज्वलता को चार चाँद लग जायेंगे
गुमसुम एक कली का केवल खिलखिलाना भर चाहिए
आलम हो मौन, शय्या पर हम, हवा सुस्त ज़रा-सी
नयन अर्ध-सुप्त, सिर्फ तेरा सुर्ख लब हिलाना भर चाहिए
शाम भले उदास रही हो, सवेरा किंतु खुशगवार बंधु
मस्ती के इशारों पर नृत्य हेतु गम भुलाना भर चाहिए
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विकास प्रताप सिंह 'हितैषी'
(...) => कार्यरत

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