कैसा मंज़र मेरी आँखों के सामने आ गया!
अंधेरों में तेरे आने से उजाला छा गया
चाँद निकलने से पहले चांदनी उभरी थी
शुक्र है उस वक्त शहर में बिजली नहीं थी
तेरा चेहरा और जुल्फें क्या अनूठे संगम थे!
चमकते झुमके झिलमिल सितारों से कम न थे
आज अपने सौंदर्य को पूनम चाँद बना ले तू
अंधेरों में तेरे आने से उजाला छा गया
चाँद निकलने से पहले चांदनी उभरी थी
शुक्र है उस वक्त शहर में बिजली नहीं थी
तेरा चेहरा और जुल्फें क्या अनूठे संगम थे!
चमकते झुमके झिलमिल सितारों से कम न थे
आज अपने सौंदर्य को पूनम चाँद बना ले तू
शहज़ादी! मेरे नाम का सिन्दूरी दाग लगा ले तू
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विकास प्रताप सिंह 'हितैषी'
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विकास प्रताप सिंह 'हितैषी'

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