मैं था, वो थी, और मंज़र अनोखा
हवा बुला-२ देती बादलों को न्योता
चुपके-२ निगाहों में होते इशारे
ऐसी सांयकाल होता मेल दिलों का
मैं था, वो थी, और दो धड़कते दिल
पलकें उठतीं, गिरतीं, ज्योंही जातीं मिल
अफसाने बनते चाहतों के निशा निमंत्रण पर
सांसें एक दूजे में होने लगतीं शामिल
हवा बुला-२ देती बादलों को न्योता
चुपके-२ निगाहों में होते इशारे
ऐसी सांयकाल होता मेल दिलों का
मैं था, वो थी, और दो धड़कते दिल
पलकें उठतीं, गिरतीं, ज्योंही जातीं मिल
अफसाने बनते चाहतों के निशा निमंत्रण पर
सांसें एक दूजे में होने लगतीं शामिल
मैं था, वो थी, घनघोर अँधेरा था
मोहब्बत के सफर का हुआ अभी कहाँ सवेरा था!
उखड़े-२ थे खड़े दोनों थोड़ी दूरी पर
उजड़ने लगा शायद अपना प्रेम बसेरा था
जागने को बेताब है अब सुबह प्रेम की
आतुर है दिनकर बुझाने को छवि द्वेष की
किंतु देर इस सवेर को और हो न जाये!
दोनों ही अड़े हैं पकड़ छड़ी अहम् की
अब भी यदि सुलझा लेते हैं झगड़े गर्म को
स्वागत करेगी रश्मि तोड़ निज भ्रम को
हँसी-खुशी जीवन बिता सकना सक्षम होगा
संग पार कर लेंगे प्यार के हरेक चरण को
मैं हूँ, वो है, 'हम' होंगे; प्रेम-दीप उज्ज्वल होंगे
सच्चा है इश्क! राह के संकट विफल होंगे
हम साथ-२ यदि पूरे दिन पश्चात भी रहते हैं,
दिल-दीपावली शुभ रात्रि खिले दिव्य सुमन होंगे
--
'हितैषी'
मोहब्बत के सफर का हुआ अभी कहाँ सवेरा था!
उखड़े-२ थे खड़े दोनों थोड़ी दूरी पर
उजड़ने लगा शायद अपना प्रेम बसेरा था
जागने को बेताब है अब सुबह प्रेम की
आतुर है दिनकर बुझाने को छवि द्वेष की
किंतु देर इस सवेर को और हो न जाये!
दोनों ही अड़े हैं पकड़ छड़ी अहम् की
अब भी यदि सुलझा लेते हैं झगड़े गर्म को
स्वागत करेगी रश्मि तोड़ निज भ्रम को
हँसी-खुशी जीवन बिता सकना सक्षम होगा
संग पार कर लेंगे प्यार के हरेक चरण को
मैं हूँ, वो है, 'हम' होंगे; प्रेम-दीप उज्ज्वल होंगे
सच्चा है इश्क! राह के संकट विफल होंगे
हम साथ-२ यदि पूरे दिन पश्चात भी रहते हैं,
दिल-दीपावली शुभ रात्रि खिले दिव्य सुमन होंगे
--
'हितैषी'
(31 अक्टूबर 2012)

No comments:
Post a Comment