फूलों से दिल लगाया
काँटों सी चुभन मिली
रो भी न सका अकेले
रात पूनम निकली
कहाँ सर छुपाऊं अब!
हर छत टपकन, गीली
सीने की आग बरसों तक
(04 नवम्बर 2012)
काँटों सी चुभन मिली
रो भी न सका अकेले
रात पूनम निकली
कहाँ सर छुपाऊं अब!
हर छत टपकन, गीली
सीने की आग बरसों तक
साँसों में दफ़न मिली
जब सहा न गया और,
तब जाके कलम चली
--
'हितैषी'
जब सहा न गया और,
तब जाके कलम चली
--
'हितैषी'
(04 नवम्बर 2012)

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