आगाह किये रखा दिल को हुस्न की महफ़िल में
आँखों के रास्ते फिर भी कहीं गिरफ़्तार हो गया
--
'हितैषी'
(08 नवम्बर 2012)
सोचा था सूरज सम आसमां पे राज करूँगा
पर चाँद से मिला और तारों सा बिखर गया
--
'हितैषी'
(08 नवम्बर 2012)
चले गये वो किस्सा-ए-तमाशा सुन कर
रोकना खूब चाहा था बेतहाशा जमकर
दे दिलासा कौन अब हमारे दिल को!
हम तो रह गये बुत-ए-हताशा बन कर
--
'हितैषी'
(09 नवम्बर 2012)
नहीं किसी हूर की मुझे आस है
बस एक कोहिनूर की तलाश है
--
'हितैषी'
(10 नवम्बर 2012)
इंतज़ार है तो रहेगा भी बरसों तक
कोई पसंद आके भुलाया नहीं जाता
--
'हितैषी'
(10 नवम्बर 2012)
कलसा उठाये पनघट पे पनिहारी चली जात है
धूलि धूसर, धूप धधकती, ऊको रोक नाहिं पात है
बैसे ही चलता जावत मन तत्त्वज्ञान की खोज में
मोह त्याग, सब छोरि-छाड़ कै, इतरावत मनोज में
--
'हितैषी'
(11 नवम्बर 2012)
ख़ाक में मिला देना, मौला, वक्त आने पर
चुस्कियां ज़िंदगी की अभी भरपूर लेने दे ||
--
'हितैषी'
(12 नवम्बर 2012)
अरसा हो गया उस ओर निकले
आज शाम आओ उधर चलें!
दीवाली है, दोस्तों से मिल लिए
थोड़ा दुश्मनों के भी घर चलें!
--
'हितैषी'
(12 नवम्बर 2012)
पास आना है तो आयें वो
न नज़र चुरा के जायें वो
वक्त किसके पास है इतना!
कि किसी को बुलाए कोई
और सब्र की सीमा भी रोई
पर रोज़ मुकर जाएँ वो ||
--
'हितैषी'
(14 नवम्बर 2012)
नहीं भाग खड़े होते वो अपने प्राण बचा के
जां निसार करके हैं वो सरहदों को सजाते
--
'हितैषी'
#दीवाली #सैनिक #शहीद #वतन
(14 नवम्बर 2012)
आँखों के रास्ते फिर भी कहीं गिरफ़्तार हो गया
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'हितैषी'
(08 नवम्बर 2012)
सोचा था सूरज सम आसमां पे राज करूँगा
पर चाँद से मिला और तारों सा बिखर गया
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'हितैषी'
(08 नवम्बर 2012)
चले गये वो किस्सा-ए-तमाशा सुन कर
रोकना खूब चाहा था बेतहाशा जमकर
दे दिलासा कौन अब हमारे दिल को!
हम तो रह गये बुत-ए-हताशा बन कर
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'हितैषी'
(09 नवम्बर 2012)
नहीं किसी हूर की मुझे आस है
बस एक कोहिनूर की तलाश है
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'हितैषी'
(10 नवम्बर 2012)
इंतज़ार है तो रहेगा भी बरसों तक
कोई पसंद आके भुलाया नहीं जाता
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'हितैषी'
(10 नवम्बर 2012)
कलसा उठाये पनघट पे पनिहारी चली जात है
धूलि धूसर, धूप धधकती, ऊको रोक नाहिं पात है
बैसे ही चलता जावत मन तत्त्वज्ञान की खोज में
मोह त्याग, सब छोरि-छाड़ कै, इतरावत मनोज में
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'हितैषी'
(11 नवम्बर 2012)
ख़ाक में मिला देना, मौला, वक्त आने पर
चुस्कियां ज़िंदगी की अभी भरपूर लेने दे ||
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'हितैषी'
(12 नवम्बर 2012)
अरसा हो गया उस ओर निकले
आज शाम आओ उधर चलें!
दीवाली है, दोस्तों से मिल लिए
थोड़ा दुश्मनों के भी घर चलें!
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'हितैषी'
(12 नवम्बर 2012)
पास आना है तो आयें वो
न नज़र चुरा के जायें वो
वक्त किसके पास है इतना!
कि किसी को बुलाए कोई
और सब्र की सीमा भी रोई
पर रोज़ मुकर जाएँ वो ||
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'हितैषी'
(14 नवम्बर 2012)
नहीं भाग खड़े होते वो अपने प्राण बचा के
जां निसार करके हैं वो सरहदों को सजाते
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'हितैषी'
#दीवाली #सैनिक #शहीद #वतन
(14 नवम्बर 2012)

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